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Idea to How to change the SOCIETY.

जय भारत जय विश्व 

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प्रणाम , वालेकुम सलाम , सत श्री कार , हेलो 

दोस्तों , हम में से प्रत्येक की यही चाहा है की उन्नति के पथ के पथिक बने रहे. सत्य /असत्य  द्वैत विचार (ऊर्जा तरगं ) का अनुभव देह को गतिमान बनाये रखता है।  इस कारण  प्रत्येक मानव विकासवान है।  विकास को प्रयास से पाना मानव स्वाभाव है।  

स्व भाव और स्वाभाव में एकता में अनेकता को प्रकट करता है।  

वर्तमान ही अतीत (स्मृति ) और भविष्य (कल्पना ) के सत्य /असत्य दैवत विचारो को सृजित करता है और मथता है।  अनंत विचारो द्वारा। 
जैसे प्रत्येक का वर्तमान का अतीत और भविष्य होता है वैसे ही प्रत्येक धार्मिक विचारधारा के विचारक का भी मत सत तत एक ही की पुष्टि करता है।  ाकोयंबहुशयामि 

ईश्वर एक है। 

वर्तमान द्धापर युग का 317 वां वर्ष ( द होली साइंस )


 करना प्रयास है और प्राप्त तथ्य को तर्कों द्वारा प्रकट करना विश्वास है और अनुभव में पाना अभ्यास है।  अभ्यास  का आधार विज्ञान हो तो क्या शेष है।  मानव (जन -जन ) के लिए।  

उत्थान का मार्ग 

उन्नति (विकास ) भौतिक सम्पनता बनाता है और उत्थान भौतिक एवं आध्यतमिक (धर्म) समर्थ  को भी सृजित करता है।  मूल स्वभवता  स्वाभाव प्रत्येक जन का के है।  

अहिंसा परमो धर्म 


यह धर्म , वह धर्म एक है।  मानव धर्म। सत्य  सरल है।

 हिन्दु,इस्लाम , सिख , ईशाई , यहूदी , बौद्ध , जैन और सब धार्मिक आध्यत्मिक विचारधारा  का उद्घोष एक है। ईश्वर एक है। 

धर्म का अर्थ है मानसिक सच्चरितता  जो अदृश्य अवयक्त हो सर्वत्र व्याप्त है।  समाज में प्रचलित सभी धार्मिक  विचारधारा विश्व के मानव समाज में अलग -अलग नामो से और अशंख्य क्रिया कलापों से सहित उपलब्ध है लोगो के लिए। यदपि सभी धार्मिक आध्यत्मिक विचारधारा भी एक कथन की पुष्टि करता है और एक ही ईश्वर को स्थापित करता है  लेकिन लोगो ने इसे ही विघटन का आधार बना कर एक मानव समाज को अपने ही द्वारा भर्मित सिमित विचारो द्वारा  समाज का विघटन किया हुआ है और इस विघटन को और विघटित कर एक मानव जाति को तोड़कर असंख्य जातिओं में बाँट कर।  दर्शा रहे है हम विकास चाहते है।  अपितु जन -जन यह समझ रखता है कि धर्म जोड़ता है।                                            विचार करे कि  समाज में प्रचलित सभी धार्मिक विचारधारा यदि धर्म को अपने अनुयायिओं के ह्रदय में सृजित कर रहा है तो एक मानव समाज को कौन छिन्न -भिन्न कर रहा है।विकासपथ  का पथिक प्रत्येक जन है।  यही कारण है जन -जन  विकास कर रहा है।  अपने प्रयासों द्वारा।   सामाजिक विघटन का आधार चाहे धार्मिक विचारधारा हो , जातियात हो या भौतिक सम्पन्नता का अंतर कुछ भी हो इससे सर्वाधिक हास सामान्य जन का होता है और इस अंतर का अधिकतम लाभ वह जन पाते है जिन्हे आम जनो के मत ने  विशेष जन(नेता )बना दिया। साधारण सी बात है विचार करें।  विकास कौन कर रहा है?

अति गहन बात है की कब तक अनीति को राजनीति कहेगें।  

राजनीति तो ऐसी व्यवस्था को सृजित करती है कुछ जनो का विकास ही नही करती अपितु जन -जन को सर्वजन हिताय  सर्वजन सुखाय  का अनुभव करा सकती है।                                                           स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कैसे नेता गण  अपने राजनैतिक दुकानों (पार्टी /दल ) के  माध्यम से अल्प समय में ही अति धनवान बन जाते है।  इन दुर्बलों की समझ इतनी निर्बल हो जाती है कि ये दलों के दल -दल में अपने को फसकर दल बदलू बन  सत्ता सुख को प्राप्त कर लेते है और अपना सुनिश्चित विकास करते है और आम जन के लिए अनिश्चित विकास के लिए तत्पर रहते है।  

परिवर्तन ही समाज को परिमार्जित कर उत्कृष्ट बनाता है 












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